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पहाड़ों की छाती पर विकास का ये कैसा बोझ?

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ये पहाड़ हमेशा से ऐसे नहीं थे , जैसे आज दिखते हैं। आज इनमें एक अनजाना सा डर समाया हुआ है , एक खामोशी है जो भीतर ही भीतर किसी आने वाले संकट की आहट देती है। पहले इन पहाड़ों में जीवन का संगीत गूँजता था। नदियों की कलकल , झरनों का शोर , हवा में घुली देवदार की महक और घुंघरुओं की तरह बजते छोटे-छोटे मंदिरों के घंटे। ये पहाड़ सिर्फ़ मिट्टी और पत्थर के ढेर नहीं थे , ये देवभूमि थी , आस्था का केंद्र थे , और लाखों लोगों के लिए जीवन का आधार थे। यहाँ के लोगों का जीवन मुश्किल ज़रूर था , पर उसमें एक ठहराव था , प्रकृति के साथ एक गहरा रिश्ता था। लोग पहाड़ों की इज़्ज़त करते थे , क्योंकि वे जानते थे कि पहाड़ उनकी रक्षा करते हैं , उन्हें पानी देते हैं , और उनका घर हैं। पर फिर समय बदला। आधुनिकता और विकास की एक ऐसी अंधी दौड़ शुरू हुई , जिसने सब कुछ बदलकर रख दिया। सुविधा और संपन्नता की चाहत ने एक ऐसी होड़ पैदा की , जिसमें हम यह भूल ही गए कि हम किसके सीने पर खड़े होकर अपनी जीत का जश्न मनाना चाहते हैं। आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो एक सवाल मन में उठता है , क्या वाकई आधुनिक समय में अत्याधिक विकास और सुविधासंप...