पहाड़ों की छाती पर विकास का ये कैसा बोझ?
ये पहाड़ हमेशा से ऐसे नहीं थे, जैसे आज दिखते हैं। आज इनमें एक अनजाना सा
डर समाया हुआ है, एक खामोशी है जो भीतर ही भीतर किसी आने वाले संकट की आहट देती है।
पहले इन पहाड़ों में जीवन का संगीत गूँजता था। नदियों की कलकल, झरनों का शोर,
हवा में घुली देवदार
की महक और घुंघरुओं की तरह बजते छोटे-छोटे मंदिरों के घंटे। ये पहाड़ सिर्फ़
मिट्टी और पत्थर के ढेर नहीं थे, ये देवभूमि थी, आस्था का केंद्र थे, और लाखों लोगों के
लिए जीवन का आधार थे। यहाँ के लोगों का जीवन मुश्किल ज़रूर था, पर उसमें एक ठहराव
था, प्रकृति
के साथ एक गहरा रिश्ता था। लोग पहाड़ों की इज़्ज़त करते थे, क्योंकि वे जानते थे कि पहाड़ उनकी रक्षा
करते हैं, उन्हें
पानी देते हैं, और उनका घर हैं। पर फिर समय बदला। आधुनिकता और विकास की एक ऐसी अंधी
दौड़ शुरू हुई, जिसने सब कुछ बदलकर रख दिया। सुविधा और संपन्नता की चाहत ने एक ऐसी
होड़ पैदा की, जिसमें हम यह भूल ही गए कि हम किसके सीने पर खड़े होकर अपनी जीत का
जश्न मनाना चाहते हैं। आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो एक सवाल मन में उठता है,
क्या वाकई आधुनिक
समय में अत्याधिक विकास और सुविधासंपन्न बनने की इस होड़ ने उत्तराखंड के पहाड़ों
की दुर्दशा कर दी है? इसका जवाब किसी एक हाँ या ना में नहीं मिल सकता, यह एक लंबी और दर्द
भरी कहानी है जो इन पहाड़ों की हर दरार में, हर धंसती हुई ज़मीन में और हर डरे हुए
चेहरे में लिखी हुई है।
उम्मीद तो कुछ और ही थी
विकास अपने आप में कोई बुरी चीज़ नहीं है। अच्छी सड़कें, स्कूल, अस्पताल, रोज़गार के साधन, ये सब किसी भी समाज की ज़रूरत हैं। उत्तराखंड के लोगों ने भी यही सपना देखा था। उन्होंने सोचा कि विकास आएगा तो उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिए दूर नहीं जाना पड़ेगा, बीमार होने पर शहर की तरफ नहीं भागना पड़ेगा, और रोजगार, अच्छे स्वास्थ्य, शिक्षा के लिए अपना पहाड़ छोड़कर मैदानी इलाकों का रुख नहीं करना पड़ेगा। इसी सपने को पूरा करने के लिए पहाड़ों में विकास की गाड़ियाँ दौड़ने लगीं। सड़कों का जाल बिछना शुरू हुआ। जो गाँव पहले पैदल चलकर ही पहुँच पाते थे, वहाँ तक गाड़ियाँ पहुँचने लगीं। यह एक सुखद बदलाव था। लोगों को लगा कि उनकी ज़िंदगी अब आसान हो जाएगी। पर्यटन को पंख लगने लगे। देश-दुनिया से लोग इन पहाड़ों की खूबसूरती देखने आने लगे, जिससे स्थानीय लोगों को आमदनी का एक नया ज़रिया मिला। नदियों की ताकत को पहचानकर बिजली बनाने के बड़े-बड़े कारखाने, यानी हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स की नींव रखी गई। इन परियोजनाओं ने हज़ारों मेगावाट बिजली पैदा करने का वादा किया, जिससे न सिर्फ़ उत्तराखंड बल्कि पूरा देश रोशन होता। देखने में यह सब कुछ बहुत अच्छा लग रहा था, एक सुनहरे भविष्य की तस्वीर जैसा। ऐसा लग रहा था मानो दशकों से पिछड़ा यह पहाड़ी राज्य अब तरक्की की नई ऊँचाइयों को छूने वाला है। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक स्याह सच छिपा हुआ था, जिसे उस वक़्त या तो अनदेखा कर दिया गया या फिर विकास के शोर में उसकी आवाज़ दबकर रह गई।
विकास ने हिला दी पहाड़ों की नींव?
पहाड़ों का सीना चीरकर सड़कें बनाना मैदानों में सड़क बनाने जैसा नहीं होता। यहाँ के पहाड़ कच्चे हैं, इनकी बनावट बहुत नाज़ुक है। ये हिमालय के सबसे नए और युवा पहाड़ों में से हैं, जो अभी भी बन रहे हैं और अपनी जगह बना रहे हैं। भूवैज्ञानिक और पर्यावरण के जानकार हमेशा से चेतावनी देते आए थे कि इन पहाड़ों के साथ ज़्यादा छेड़छाड़ करना बेहद ख़तरनाक हो सकता है। चार धाम यात्रा को जोड़ने वाली महत्वाकांक्षी सड़क परियोजनाओं के लिए हज़ारों टन डायनामाइट का इस्तेमाल किया गया। इन धमाकों ने पहाड़ों की नींव को हिलाकर रख दिया। सड़कों को चौड़ा करने के लिए पहाड़ों को जिस बेतरतीबी से काटा गया, उससे उनका संतुलन बिगड़ गया। हज़ारों-लाखों पेड़, जो अपनी जड़ों से मिट्टी को बाँधकर रखते थे, उन्हें काट दिया गया। पहाड़ नंगे हो गए। कटाई के बाद जो भारी मात्रा में मलबा निकला, उसे सीधे नीचे बहती नदियों में फेंक दिया गया। इस मलबे ने नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को रोका, जिससे उनका तल ऊपर उठ गया और ज़रा सी बारिश में ही वे उफनकर बाढ़ की शक्ल लेने लगीं। यह विकास नहीं था, यह पहाड़ों के शरीर पर किए गए अनगिनत घाव थे, जो धीरे-धीरे रिसने लगे थे। आज हम जो भूस्खलन की घटनाएँ आए दिन देखते और सुनते हैं, जहाँ ज़रा सी बारिश में पहाड़ दरक जाते हैं और सड़कें बंद हो जाती हैं, वो इसी अंधाधुंध विकास का नतीजा हैं। हाल ही में 5 अगस्त को धराली में सारी दुनिया ने इसी विकास का परिणाम देखा।
आपदाएँ प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का ही परिणाम है
सड़कों की कहानी से भी ज़्यादा चिंताजनक कहानी उन नदियों की है,
जिन्हें उत्तराखंड
की जीवनरेखा माना जाता है। गंगा, यमुना और उनकी अनगिनत सहायक नदियाँ सिर्फ़ पानी
का स्रोत नहीं, बल्कि राज्य के लोगों की आस्था का
प्रतीक हैं। हमने इन नदियों की ऊर्जा का इस्तेमाल करने के लिए उन्हें जगह-जगह
बाँधना शुरू कर दिया। बड़े-बड़े बाँध और सुरंग आधारित बिजली परियोजनाएँ पहाड़ों के
भीतर तक घुस गईं। इन परियोजनाओं के निर्माण के लिए जो सुरंगें खोदी गईं, उन्होंने पहाड़ों को
अंदर से खोखला कर दिया। पानी को एक जगह इकट्ठा करने के लिए बनी विशालकाय झीलों के
दबाव ने ज़मीन के नीचे की टेक्टोनिक प्लेटों पर अतिरिक्त बोझ डाला, जिससे उस क्षेत्र
में भूकंपीय गतिविधियाँ बढ़ने का ख़तरा पैदा हो गया। प्रकृति ने इन नदियों को
आज़ाद बहने के लिए बनाया था, पर हमने मुनाफ़े और बिजली के लिए उन्हें कैद कर
लिया। इसका सबसे दर्दनाक उदाहरण हमने साल 2021 में ऋषिगंगा घाटी में देखा, जब एक ग्लेशियर के
टूटने से आई बाढ़ ने निर्माणाधीन बिजली परियोजनाओं को तबाह कर दिया और सैकड़ों
लोगों की जान ले ली। यह एक प्राकृतिक आपदा की तरह दिखी, लेकिन असल में यह मानव निर्मित लालच और
प्रकृति के साथ की गई छेड़छाड़ का मिला-जुला परिणाम था। हमने यह समझने की कोशिश ही
नहीं की कि ग्लेशियरों के इतने करीब, इतने नाज़ुक पर्यावरण वाले क्षेत्र में इस तरह का
भारी निर्माण कितना विनाशकारी हो सकता है। नदियों को रोककर हमने सिर्फ़ उनकी गति
ही नहीं रोकी, बल्कि उस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर दिया जो उन पर निर्भर
था।
कोंक्रीट और पहाड़ का रिश्ता
विकास की इस होड़ का एक और बड़ा पहलू है अनियंत्रित पर्यटन और
शहरीकरण। जैसे-जैसे पहाड़ों तक पहुँचना आसान हुआ, वैसे-वैसे यहाँ भीड़ बढ़ने लगी। पर्यटन
रोज़गार देता है, लेकिन जब यह बिना किसी योजना और नियम-कानून के होता है, तो यह एक बोझ बन
जाता है। शांत और पवित्र माने जाने वाले तीर्थ स्थानों पर बड़े-बड़े होटल, रिसॉर्ट और बाज़ार
खड़े हो गए। नदी के किनारों तक, जहाँ निर्माण की सख्त मनाही होनी चाहिए थी,
वहाँ भी कंक्रीट के
जंगल उग आए। इस भीड़ को संभालने के लिए पहाड़ों की क्षमता का कोई आकलन नहीं किया
गया। हर साल आने वाले लाखों पर्यटक और उनकी गाड़ियों ने इन छोटे-छोटे कस्बों पर
भारी दबाव डाला। पानी की खपत बढ़ गई, जिससे स्थानीय जल स्रोत, जिन्हें 'धारे'
और 'नौला' कहा जाता है,
सूखने लगे। कचरे के
ढेर लगने लगे, खासकर प्लास्टिक का कचरा, जिसके निस्तारण की कोई ठोस व्यवस्था नहीं थी। यह
कचरा नालियों से होता हुआ नदियों में और ज़मीन के भीतर जाने लगा, जिससे पानी ज़हरीला
होता गया। इसका सबसे भयावह रूप जोशीमठ शहर के धंसने के रूप में सामने आया। जोशीमठ,
जो कि एक बहुत
पुराने भूस्खलन के मलबे पर बसा हुआ शहर है, अपनी क्षमता से कई गुना ज़्यादा बोझ झेल
रहा था। अनियंत्रित निर्माण, पानी के रिसाव की सही व्यवस्था का न होना,
और पास में चल रही
बिजली परियोजनाओं के निर्माण ने मिलकर उस शहर की नींव को हिला दिया। घरों में
दरारें आने लगीं, ज़मीन धंसने लगी और सदियों से वहाँ रह रहे लोगों को रातों-रात अपना घर
छोड़कर भागने पर मजबूर होना पड़ा। यह किसी एक शहर की कहानी नहीं है, यह उत्तराखंड के कई
शहरों और कस्बों की सच्चाई बनने की कगार पर है, जो विकास के नाम पर अपनी सहनशक्ति की
अंतिम सीमा पर पहुँच चुके हैं।
पहाड़ से पहाड़ी खत्म हो रहे
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे गहरा और दुखद असर यहाँ के समाज और संस्कृति पर पड़ा है। पहाड़ों का जीवन प्रकृति के साथ एक लय में चलता था। खेती, पशुपालन और जंगल पर आधारित एक आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था थी। लोगों के बीच एक गहरा सामाजिक जुड़ाव था। लेकिन विकास की इस नई परिभाषा ने उस पूरी जीवनशैली को तहस-नहस कर दिया। खेती की ज़मीनें सड़क, होटल या अन्य परियोजनाओं के लिए अधिग्रहित कर ली गईं। जो बची-खुची खेती थी, उसे जंगली जानवर बर्बाद करने लगे क्योंकि उनके रहने के जंगल भी सिकुड़ते जा रहे थे। पानी के स्रोत सूखने से खेती और मुश्किल हो गई। पारंपरिक ज्ञान और हुनर, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे थे, वे अब अप्रासंगिक होने लगे। नई पीढ़ी को लगा कि पहाड़ों में भविष्य नहीं है, और वे रोज़गार की तलाश में शहरों की ओर भागने लगे, जिसे 'पलायन' कहा जाता है। गाँव के गाँव खाली हो गए, घरों में ताले लग गए और खेत बंजर हो गए।
यह एक अजीब विडंबना है। एक तरफ हम पहाड़ों में सुविधाएँ पहुँचाने का दावा कर रहे थे, और दूसरी तरफ हम वहाँ से लोगों को जाने के लिए मजबूर कर रहे हैं। जो लोग रुक गए, वे भी अब एक अजीब से डर में जी रहे हैं। उन्हें नहीं पता कि कब बारिश उनके घरों को बहा ले जाएगी, कब ऊपर से कोई पत्थर लुढ़ककर उनकी ज़िंदगी छीन लेगा, या कब उनके पैरों के नीचे की ज़मीन ही खिसक जाएगी। 2013 की केदारनाथ त्रासदी की भयानक यादें आज भी लोगों के दिलों में ताज़ा हैं, जब विकास के प्रतीक होटल और दुकानें ताश के पत्तों की तरह नदी के सैलाब में बह गए थे। पिछले कुछ सालों में ये तो समझ आ ही गया है कि आपदा सिर्फ़ बादल फटने या बारिश का नतीजा नहीं थी, बल्कि नदी के रास्ते में किए गए अतिक्रमण और अनियोजित निर्माण पर प्रकृति का एक शक्तिशाली प्रहार भी है।
सुविधाभोगी पर्यटन ने बिगाड़ दिया खेल
इसी सुविधाभोगी पर्यटन का एक और चिंताजनक चेहरा
आसमान में दिखाई देता है। अब तीर्थ यात्रा और सैर-सपाटे के लिए हेलीकॉप्टरों का
इस्तेमाल एक आम बात हो गई है। कुछ घंटों में मुश्किल सफर तय करने की यह सुविधा
देखने में बहुत आकर्षक लगती है, लेकिन इसके पीछे का सच बहुत भयावह है।
हेलीकॉप्टरों का कानफाड़ू शोर और उनके शक्तिशाली रोटरों से पैदा होने वाला कंपन इन
शांत घाटियों की आत्मा पर प्रहार करता है। यह सिर्फ ध्वनि प्रदूषण नहीं है, यह
एक ऐसा कंपन है जो इन कच्ची और संवेदनशील चट्टानों को धीरे-धीरे कमजोर करता है,
जिससे
भूस्खलन का खतरा और भी बढ़ जाता है। ऊँचाई वाले इलाकों में, ग्लेशियरों के
पास, यह कंपन और भी खतरनाक साबित हो सकता है। जो पक्षी और जानवर सदियों से
इन शांत वादियों में रहने के आदी हैं, वे इस अचानक और तेज शोर से डरकर अपना
घर छोड़ देते हैं, उनके प्रजनन चक्र में बाधा आती है और उनका पूरा
व्यवहार बदल जाता है। जिस देवभूमि की शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा को महसूस करने के
लिए लोग आते हैं, उसी भूमि के आसमान का सीना चीरता यह शोर उस
शांति को भंग कर देता है। यह आस्था का एक हवाई बाजारीकरण है, जहाँ
सुविधा के नाम पर हम प्रकृति के उस अंतिम किले में भी घुसपैठ कर रहे हैं जो अब तक
इंसानी कोलाहल से कुछ हद तक बचा हुआ था।
इस सब के बीच, हमने सिर्फ़ पहाड़, जंगल या नदियाँ ही नहीं खोई हैं,
हमने उस रिश्ते को
खो दिया है जो इंसान और प्रकृति के बीच होना चाहिए। हमने पहाड़ों को एक वस्तु मान
लिया, जिसे
अपनी मर्ज़ी से काटा, तोड़ा और बेचा जा सकता है। हम भूल गए कि ये पहाड़ जीवित हैं, ये साँस लेते हैं।
इनकी एक आत्मा है। इनकी भी एक सहन करने की क्षमता होती है। जब हम उस क्षमता से
ज़्यादा बोझ इन पर डालते हैं, तो ये जवाब देते हैं, और जब ये जवाब देते हैं तो इनकी
प्रतिक्रिया बहुत विनाशकारी होती है। आज जो डर, जो चिंता और जो पीड़ा इन पहाड़ों में
महसूस हो रही है, वह असल में पहाड़ों का अपना दर्द है। यह उस विकास मॉडल पर एक गंभीर
सवाल है जो सिर्फ़ कंक्रीट के निर्माण और पैसे के मुनाफ़े को ही तरक्की मानता है,
और उसके बदले में
चुकाई जाने वाली पर्यावरणीय और सामाजिक कीमत को नज़रअंदाज़ कर देता है। सुविधाएँ
ज़रूरी हैं, पर किस कीमत पर? यह कहना
गलत नहीं होगा कि विकास और सुविधासंपन्न बनने की इच्छा ने नहीं, बल्कि उस इच्छा को
पूरा करने के लिए अपनाए गए अंधे, अनियोजित और लालची तरीकों ने उत्तराखंड के
पहाड़ों की यह दुर्दशा की है। समस्या विकास से नहीं, विकास की उस परिभाषा से है जिसमें प्रकृति,
स्थानीय लोगों और
आने वाली पीढ़ियों के लिए कोई जगह नहीं है। हमने पहाड़ों की सुनने की कोशिश ही
नहीं की, हमने
विशेषज्ञों की चेतावनियों को अनसुना कर दिया और अपनी तकनीकी ताकत के घमंड में यह
मान लिया कि हम प्रकृति को नियंत्रित कर सकते हैं। आज जब राज्य के कई गाँव धंस रहे हैं, जब भूस्खलन की घटनाएँ आम हो गई हैं, और जब नदियाँ
क्रोधित होकर अपने किनारे तोड़ रही हैं, तो यह असल में इन सिसकते हुए पहाड़ों की एक चीख
है, एक
पुकार है, जो हमसे
कह रही है कि अब बस करो। यह एक चेतावनी है कि अगर हम अब भी नहीं संभले, अगर हमने विकास और
प्रकृति के बीच संतुलन साधना नहीं सीखा, तो यह देवभूमि अपनी उस पहचान को हमेशा के लिए खो
देगी जिसके लिए वह जानी जाती है। और जो पहाड़ आज कांप रहे हैं, उनका यह कंपन शायद
हमारे उस तथाकथित विकास के ताबूत में आख़िरी कील साबित होगा, जिसके नीचे हम सब
दबे होंगे। यह चिंता का विषय है, यह हम सबके अस्तित्व से जुड़ा एक भावनात्मक सवाल
है, जिसका
जवाब हमें जल्द ही खोजना होगा, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।
-अभिषेक सेमवाल
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