ये पहाड़ हमेशा से ऐसे नहीं थे , जैसे आज दिखते हैं। आज इनमें एक अनजाना सा डर समाया हुआ है , एक खामोशी है जो भीतर ही भीतर किसी आने वाले संकट की आहट देती है। पहले इन पहाड़ों में जीवन का संगीत गूँजता था। नदियों की कलकल , झरनों का शोर , हवा में घुली देवदार की महक और घुंघरुओं की तरह बजते छोटे-छोटे मंदिरों के घंटे। ये पहाड़ सिर्फ़ मिट्टी और पत्थर के ढेर नहीं थे , ये देवभूमि थी , आस्था का केंद्र थे , और लाखों लोगों के लिए जीवन का आधार थे। यहाँ के लोगों का जीवन मुश्किल ज़रूर था , पर उसमें एक ठहराव था , प्रकृति के साथ एक गहरा रिश्ता था। लोग पहाड़ों की इज़्ज़त करते थे , क्योंकि वे जानते थे कि पहाड़ उनकी रक्षा करते हैं , उन्हें पानी देते हैं , और उनका घर हैं। पर फिर समय बदला। आधुनिकता और विकास की एक ऐसी अंधी दौड़ शुरू हुई , जिसने सब कुछ बदलकर रख दिया। सुविधा और संपन्नता की चाहत ने एक ऐसी होड़ पैदा की , जिसमें हम यह भूल ही गए कि हम किसके सीने पर खड़े होकर अपनी जीत का जश्न मनाना चाहते हैं। आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो एक सवाल मन में उठता है , क्या वाकई आधुनिक समय में अत्याधिक विकास और सुविधासंप...
CLIMATE CHANGE IN HIMALAYAS : उत्तराखंड में हो रहे विकास कार्यों के कारण पर्यावरणीय संकट और पारिस्थितिकी तंत्र का विनाश एक गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। जबकि विकास को राज्य की आर्थिक प्रगति के लिए आवश्यक माना जाता है, बिना पर्यावरणीय संतुलन रखे किए गए कार्य अक्सर दीर्घकालिक नुकसान का कारण बनते हैं। विकास कार्यों के चलते पहाड़ी क्षेत्रों की विशिष्ट भौगोलिक स्थिति और संवेदनशील पारिस्थितिकी अस्थिर हो रही है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और विकास की कीमत उत्तराखंड में विकास के नाम पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई ने एक गंभीर संकट को जन्म दिया है। 2024-25 में देहरादून-ऋषिकेश मार्ग पर सड़क चौड़ीकरण के लिए 3,300 पेड़ों की कटाई की योजना बनाई गई। इससे पहले दिल्ली-देहरादून राजमार्ग चौड़ीकरण के तहत 31,750 पेड़ों की बलि दी जा चुकी थी। इन विकास कार्यों के लिए पेड़ों की बलि ने जलवायु परिवर्तन को और बढ़ावा दिया है, क्योंकि पेड़ों की कमी से वायुमंडलीय तापमान में वृद्धि हो रही है और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। पर्यावरणीय कार्यकर्ताओं और स्थानीय निवासियों ने इन फैसलों का विरोध क...
“हाँ ये चाय रख दो यहाँ पर” मैंने छोटू को मेज की तरफ इशारा करते हुए कहा, ये वक़्त शाम की चाय का था और पिछले कुछ दिनों से एक नया लड़का चाय देने आ रहा था,यूँ तो चाय उसी टपरी की थी,पर स्वाद और जायका बदल गया गया था,पहले एक लड़की वहाँ चाय बनाती थी और अब शायद उसका भाई। मैं इस शहर में एक साल से रह रहा था,मैं एक छोटे से कस्बे का जोशीमठ का रहने वाला था और श्रीनगर जैसे बड़े शहर में पिछले एक साल से जल निगम में सहायक क्लर्क के पद पर था,यूँ तो काम कुछ ज्यादा था नहीं पर मेरे लिए बहुत जरूरी था, क्योंकि ये मेरी पहली नौकरी और दूसरी बात ये कि मैं घर से दूर निकल गया था जो कि मैं हमेशा से चाहता था। मेरी आँखों में मेरे ऑफिस का पहला दिन चल रहा था ,जब मैं नई जगह नई नौकरी को लेकर उत्साहित और थोड़ा सा नर्वस भी था और अपने पहले ही दिन कुछ ऐसा करना चाहता था कि मेरा मन इस नई जगह में रम जाए,यूँ तो मैं कोई दक्षिण भारतीय फिल्मों का कोई फंतासी नायक तो था नहीं कि कुछ असाधारण कार्य कर दूं और सबकी नजरों में हीरो बन जाऊं.......मुझे तो खुद के लिए कुछ वजह तलाशनी थी जिसके बूते मैं एक नए और अपेक्षा कृत बड़े शहर में रह ...
Comments
Post a Comment