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पंचम केदार कल्पेश्वर : यात्रा गाइड (कल्पेश्वर कैसे पहुँचे)

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    समुद्र तल से 2200 मीटर की ऊंचाई पर उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ(joshimath) तहसील की उर्गम घाटी में स्तिथ है| और पंच केदारों से ये मंदिर इस तरह अलग है कि यहाँ पर पूरे साल भर शिव जी की पूजा कलपेश्वर महादेव(kalpeshwar) का मंदिर पंच केदारों मे से एक भगवान शिव को समर्पित मंदिर है |ये मंदिर अर्चना होती है और मंदिर साल भर श्रद्धालुओं के लिए खुला रहता है जबकि पंच केदारों में सम्मिलित अन्य मंदिर शीत काल में बंद हो जाते हैं| इस मंदिर को स्थानीय क्षेत्रों में कल्पनाथ(kalpnath) के नाम से भी जाना जाता है,मंदिर जिला मुख्यालय गोपेश्वर (gopeshwar) से 50   किलोमीटर दूर है और करीब 300 मीटर के पैदल रास्ते के द्वारा मंदिर तक पहुंचा जा सकता है| अगर कलपेश्वर नाम पर गौर करें तो पौराणिक कथाओं के अनुसार ये नाम मुख्यतः कल्प शब्द से बना है जो कि स्वर्ग में पाए जाने वाले वाले वृक्षों मे से एक कल्प वृक्ष के लिए प्रयुक्त शब्द है |कहा जाता है कि प्राचीन समय में ये वृक्ष लोगों को वरदान देने वाला होता था और श्रीकृष्ण जी द्वारा पत्नी सत्यभामा के कहने पर स्वर्ग में स्थापित किया गया था | और इ...

COMFORT ZONE

 बात है कम्फर्ट जोन की, जब आप किसी प्रकार का कम्फर्ट जोन बना लेते है  वो कम्फर्ट जोन  कोई शख्स हो सकता है  या कोई चीज हो  सकती है या कई बार आपकी कोई आदत भी वो हो सकती है मतलब आप उस चीज के साथ आप अपना हर क्षण बिताना चाहते हैं यही तो जादू होता है कम्फर्ट जोन में , और आप उसे छोड़ना नही चाहते हैं, या उस चीज से दूर नहीं होना चाहते हैं... यही बात कई बार आपको  जीवन में  कोई ठोस कदम उठाने से रोक देता है या कुछ बेहतर करने से रोक देता है।  कितना कुछ बदल देता है किसी चीज का कम्फर्ट ज़ोन  और जब वो कम्फर्ट जोन किसी भी कारण से आपके पास नहीं होता या दूर हो जाता है तो जिंदगी में काफी उठा पटक होने लगती है, और जिंदगी पटरी से उतरी हुई हो जाती है, और अक्सर ये सब बातें किसी की भी जिंदगी में बहुत बदलाव लाती है जो कि आमतौर पर निराशावादी ही होते हैं,लोग अपने जीवन में बहुत ही छोटी  छोटी चीजों पर अपना धैर्य ,अपनी उम्मीदें खो देते हैं और ये सब होता है बस कुछ भूत काल में लिए गये गलत फ़ैसलों के कारण। अब मान लीजिये इस वक़्त मैं कोई नया शौक पाल लेता हूँ जो समय के हिस्से म...

तुम्हारे लिए प्रेम पत्र

मेरी प्रियतमा, कैसी हो तुम??उम्मीद करता हूँ तुम अच्छी होगी, मैं भी सही हूँ। आज तुम्हें अधखिले और अधभरे मन से पत्र लिख रहा हूँ,अधभरा मन इसलिए कि मेरा मन इस बात को लेकर भर आता है कि हम तुम अब साथ नहीं हैं, जीवन के उतार चढ़ावों में शायद हम दोनों एक दूसरे को संभाल नहीं सकें,हमने एक दूसरे के हाथों को कसकर नहीं थामा होगा तभी हमारे हाथ छूट गये होंगे,और हमारा साथ भी छूट गया। मेरा मन अधखिला इसलिए है कि मेरे पास प्रेमिका तो नहीं है, लेकिन प्रेम बहुत सारा है,तुम्हारा प्रेम,हमारा प्रेम, प्रेम जिसने मेरे जीवन की सारी परिभाषाएँ बदल दी है।तुम्हारे साथ बिताये खुशियों के पल मेरे लिए मानो नीले से आसमान में गुलाबी बादलों की तरह थे,जो सिर्फ सुहाना मौसम ही नहीं लाये बल्कि मेरे जीवन में वो क्षण लाये थे जिन्होंने मुझे एक आम लड़के से इंसान बनाया है, मुझे जीना सिखाया है। तुम्हारे मुझ से अलग हो जाने के बाद वो सारे गुलाबी बादल काले से हो गये हैं, ये बहुत बड़ी उपमा हो सकती है लेकिन मैं ऐसा नहीं कहता कि काले बादलों से जीवन में कुछ बुरा हुआ है, ये तो शायद कले रंग के साथ नाइंसाफी होगी क्योंकि उसका भी अपना अस्तित्व ...

जीवन

  जीवन के  कुछ क्षण मेरे लिए पीले रंग के जैसे थे क्योंकि मेरे जीवन में प्रेम  आ रहा था और प्रेम का रंग पीला होता है , पीला रंग अक्सर दर्शाता है कि नया सृजन होने को है जैसे वसंत का आना जिसमें एक नई सृष्टि का सृजन और विकास होता है और पीला रंग होता है सूर्य की किरणों का जो हर दिन आकर पूरी पृथ्वी में जीवन का संचार और जीवन का निर्माण करती है ठीक इसी तरह प्रेम भी पीले रंग का होता है क्योंकि वो हमारे भीतर एक नए व्यक्तित्व का सृजन और विकास करता है , आप प्रेम को अन्य रंगों के साथ जोड़ सकते है जैसे कि लाल रंग जो कि प्रेम की उच्चतम सीमा है जहां पर प्रेमियों की आत्मा एकरूपी हो जाती है और गुलाबी रंग में दिखता है प्रेम का उल्हास और संभावनाएं .. लेकिन इन सब को बाहर से थामे हुए प्रेम का रंग पीला होता है ...... सेमवाल जी नवोदय वाले

फूल पत्ती

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  फूल पत्ती और , हथेलियों मे प्रेम  मुट्ठी बंद की तो प्रेम मेरा  मुट्ठी खोली तो प्रेम ईश्वर का  -सेमवाल जी नवोदय  वाले  

जनवरी की बारिश

 बाहर बारिश हो रही थी, जनवरी की बारिश ,वैसे आजकल मौसम बड़ा ही ठंडा था और बारिश ने तो हाल और बुरे कर दिये थे, मैं अपने कमरे में बैठा हुआ खिड़की से बाहर देख रहा था ,मैं दूसरी मंजिल पर रहता हूँ मेरे कमरे के आगे एक छत है जिस से पूरे कस्बे का दृश्य साफ दिखता है, और नदी पार तक सारा दृश्य बारिश के बीचों बीच मैं अपने कमरे में बैठा देख रहा था । तभी क्या देखता हूँ अंतरा बाहर बारिश में जा रही है, ये लड़की बारिश को देखकर पागल सी हो जाती थी जब कभी बारिश होती तो चिनखी(बकरी का छोटा सा बच्चा, जो बहुत प्यारा होता है) की तरह भा बारिश में उछल कूद  करने लगती थी, वो मेरे बगल वाले कमरे में रहती थी, अक्सर हम दोनों छत में बैठे हुए रहते थे जब भी धूप रहती थी तो इस वक़्त तो बिल्कुल अलग हाल थे। अंतरा बारिश में कुछ और ही बन जाती थी उसके अंदर का अंतर्मुखी सा छोटा बच्चा गायब सा हो जाता था ओर एक शैतान चंचल और नटखट सी अंतरा बारिश में भीगते हुए मेरे सामने थी, वो एक दम चिनखी लग रही थी कभी इस कोने खेल रही थी कभी उस कोने पर , उछल कूद में व्यस्त । मैं उसको यूँ देखता ही रह गया , और सब कुछ भूल गया जैसा कि अक्सर होता था ...

उधार खाता

आज का दिन बड़ा ही उबाऊ और आलस भरा रहा था,दिन भर मैंने कमरे में लेटे लेटे ही वक़्त काट लिया था। जैसे ही घड़ी ने शाम के साढ़े पांच बजाये मेरे भीतर का पहाड़ी मनुष जाग गया,मै उठा और हाथ मुँह धोकर पहुंच गया आंटी की दुकान पर चाय पीने..... आंटी की दुकान के बारे में बता दूँ की ये दुकान सिर्फ नाम से आंटी की दुकान है, लेकिन यहाँ पर आकर आपको सारी दुनिया की खबरें ,ढेर सारा ज्ञान, और सोशलायज़िंग का पूरा मसाला मिल जायेगा और साथ में आंटी की तीखी जबान से दिल चीर देने वाले नश्तर और मीठी चाय और नमकीन समोसे ,तो ये मेरे जैसे भूले भटकों और दर्द में कराहने वालों के लिए औषधालय से कम नहीं था यहाँ पर आकर कुछ देर के लिए ही सही मैं सब कुछ भूल कर दुनिया भर की बकवास और बकवास मे छुपी बहुत सारी चटपटी बातों मे खो जाता था। आज भी यही सब हो रहा था,जैसा की अक्सर ऐसी चाय की दुकानों में होता ही है, भांति भांति प्रकार के किरदार अपना एक्ट कर रहे थे,ऐसे में एक हमारे एक मित्र दुकान मे आ पहुंचे, जो कि एक तरह से हमारे क्लासमेट भी थे।वो उम्र में मुझ से करीब दस साल बड़े थे, अब वो किस तरह मेरे क्लासमेट थे ये मैं आप लोगों की कल्पना पर ...

आभा

बिल्कुल सादे सूट सलवार में,न चेहरे पर पाउडर की चमक ना होंटो पर हल्की गुलाबी लाली ना चेहरे पर दीप्त मुस्कान,बिल्कुल काया पलट हो गया मानो, ये वही लड़की है जिसे मैं जानता हँ की मेकअप और कपड़ो के लिए कहीं बाहर जाना तक कैंसल कर देती थी और आज मेरे सामने बिल्कुल सादी सी वेशभूषा में खड़ी थी,मैं बिल्कुल अचंभे में था और मेरा चौंक जाना लाजमी था ये वही लड़की थी जो कॉलेज के दिनों में इतनी जिंदा दिल और हंसमुख सी लड़की हुआ करती थी आज बहुत ही संजीदा और शांत लग रही थी। मैं उससे पूछना चाहता था की ये जो मैं देख रहा हूँ ये सब हाल तुमने क्यों और कैसे बना लिया है। तो कहानी शुरु हुई जब कॉलेज की शुरुआत में तो मेरी मुलाक़ात आभा से हुई थी,और यूँ कहूँ की पहली नजर में उसके लिए मेरे दिल में तितलियाँ उड़ने लगी थी,लेकिन मैं तो भंवरा बन कर किसी और फूल की ओर उड़ गया,फिर वक़्त बीता और मेरा प्रेम का फूल मुरझा गया और मैंने दिल टूटे आशिक की डिग्री पा ली,ये तो हुई मेरी कहानी लेकिन ये कहानी तो आभा की है । आभा के बारे में जितना जान सका वो सब मेरी कुछ सखियों के बदौलत है,वैसे मेरी कुछ बातचीत होती रहती थी उस से लेकिन इन चीजों मे कभी...

चाय की प्याली

  “हाँ ये चाय रख दो यहाँ पर” मैंने छोटू को  मेज की तरफ इशारा करते हुए कहा, ये वक़्त शाम की चाय का था और पिछले कुछ दिनों से एक नया लड़का चाय देने आ रहा था,यूँ तो चाय उसी टपरी की थी,पर स्वाद और जायका बदल गया गया था,पहले एक लड़की वहाँ चाय बनाती थी और अब शायद उसका भाई। मैं इस शहर में एक साल से रह रहा था,मैं एक छोटे से कस्बे का जोशीमठ का रहने वाला था और श्रीनगर जैसे बड़े शहर में पिछले एक साल से जल निगम में सहायक क्लर्क के पद पर था,यूँ तो काम कुछ ज्यादा था नहीं पर मेरे लिए बहुत जरूरी था, क्योंकि ये मेरी पहली नौकरी और दूसरी बात ये कि मैं घर से दूर निकल गया था जो कि मैं हमेशा से चाहता था। मेरी आँखों में मेरे ऑफिस का पहला दिन चल रहा था ,जब मैं नई जगह नई नौकरी को लेकर उत्साहित और थोड़ा सा नर्वस भी था और अपने पहले ही दिन कुछ ऐसा करना चाहता था कि मेरा मन इस नई जगह में रम जाए,यूँ तो मैं कोई दक्षिण भारतीय फिल्मों का कोई फंतासी नायक तो था नहीं कि कुछ असाधारण कार्य कर दूं और सबकी नजरों में हीरो बन जाऊं.......मुझे तो खुद के लिए कुछ वजह तलाशनी थी जिसके बूते मैं एक नए और अपेक्षा कृत बड़े शहर में रह ...

तुम्हारी हथेलियां

  तुमने जब प्रेम वश पीछे से आकर मेरी आँखों पर हाथ रख लिए अपने वैसे तो ये तुम्हारा बचपना था मगर मेरे लिए ऐसा था कि जैसे तुम कह रही हो “मत देखो कुछ भी मत देखो दुनिया को मत देखो समाज को मत देखो रूढ़ियों को मत देखो बेढंगे रिवाज को बस तुम देखो आँखे बंद कर मुझे बस महसूस करो मेरे हाथों का स्पर्श” सच मे तुम्हारी हथेलियों में कोई तिलिस्म जरूर था तुमने हर ली थी सारी बेचैनियां मेरी सारी उलझनें काफूर हो गयी थी उस एक पल में तुमने जब प्रेम वश पीछे से आकर मेरी आँखों पर हाथ रख लिए अपने .. .. © सेमवाल जी नवोदय वाले